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पाकिस्तान युद्ध 1965: जब भारतीय सेना ने लाहौर पर कदम रखा | India-Pakistan War 1965 | New PaperDoll

पाकिस्तान युद्ध 1965: जब भारतीय सेना ने लाहौर पर कदम रखा | India-Pakistan War 1965

भारत की कमजोरी का फायदा उठाना चाहता था पाकिस्तान

1962 में चीन से मिली हार के बाद भारतीय सेना का मनोबल गिरा हुआ था। मई 1964 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निधन से देश की राजनीति में एक रिक्तता आ गई थी। इसी समय भारत के कई हिस्सों में अकाल की स्थिति भी बनी हुई थी।दूसरी ओर, अमेरिका से 1953 में की गई रक्षा समझौते के तहत मिले आधुनिक हथियारों से पाकिस्तान के हौसले बुलंद थे। उसकी अर्थव्यवस्था तेजी से विकास कर रही थी।

1958 में पाकिस्तान के सेना प्रमुख अयूब खान ने चुनी हुई सरकार का तख्तापलट करके राष्ट्रपति की कुर्सी संभाली। उनकी नज़रों में कश्मीर हमेशा से एक कांटे की तरह खटक रहा था। अयूब खान ने पाकिस्तानी सेना को भारत पर हमले का आदेश देते हुए कहा था, “सही समय और सही स्थान पर कुछ निर्णायक हमलों के सामने हिंदुओं का साहस टिक नहीं सकता। हमें ऐसे अवसर हाथ से नहीं जाने देने चाहिए।”

कच्छ की झड़प ने बढ़ाया पाकिस्तान का आत्मविश्वास

जनवरी 1965 में पाकिस्तान ने गुजरात के कच्छ के रण में भारतीय क्षेत्रों में अपनी चौकियां स्थापित कर लीं। 9 अप्रैल को विवादित भूमि पर कब्जा करने के लिए उसने ‘ऑपरेशन डेजर्ट हॉक’ शुरू किया। भारतीय पुलिस और सीआरपीएफ के जवानों ने इस हमले को नाकाम कर दिया और चार पाकिस्तानी सैनिकों को गिरफ्तार भी किया।

जून 1965 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री हैरॉल्ड विल्सन ने इस विवाद को सुलझाने के लिए एक न्यायाधिकरण बनाने पर दोनों देशों को राजी कर लिया। पाकिस्तान ने इसे भारत की कमजोरी समझा। आत्मविश्वास से भरे अयूब खान को लगा कि भारत से कश्मीर छीनने का यह उचित समय है, क्योंकि देर करने पर भारत और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा।

ऑपरेशन जिब्राल्टर: कश्मीर पर कब्जे की चाल

1965 में पाकिस्तान ने अपने 30 हजार लड़ाकों को कश्मीर में घुसपैठ कराने की योजना बनाई। इनका उद्देश्य था कश्मीर में आतंक फैलाना और स्थानीय लोगों को भारत और सेना के विरुद्ध भड़काना, जिससे पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर कब्जा करना आसान हो जाए। इस अभियान का नाम था ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’। दरअसल, स्पेन के निकट जिब्राल्टर नामक एक छोटा द्वीप है। जब यूरोप पर विजय प्राप्त करने के लिए अरब देशों की सेना पश्चिम की ओर बढ़ी थी, तो उनका पहला पड़ाव जिब्राल्टर ही था। वहां से आगे बढ़कर अरबी सेना ने पूरे स्पेन पर विजय प्राप्त की थी।

पाकिस्तान का मानना था कि एक बार जब वह भारत के जिब्राल्टर (कश्मीर) पर कब्जा कर लेगा, तो भारत को पराजित कर देगा। इस ऑपरेशन की कमान मेजर जनरल अख्तर हुसैन मलिक को सौंपी गई। अभियान के लिए पाकिस्तानी सेना के जवानों और अधिकारियों ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में प्रशिक्षण लेकर भारत में घुसपैठ की। उन्हें राइफल, बंदूक और ग्रेनेड भी दिए गए और छापामार युद्ध करना सिखाया गया।

कश्मीरियों ने दिया भारत का साथ

5 अगस्त 1965 को पाकिस्तान के लगभग 33 हजार सैनिक कश्मीरी वेश में नियंत्रण रेखा (LoC) पार कर गए। इन सैनिकों का पहनावा और रहन-सहन कश्मीरियों जैसा था। उनका लक्ष्य था कश्मीर के महत्वपूर्ण स्थानों जैसे पुल, डाकघर, टेलीफोन केंद्र, संचार नेटवर्क और सरकारी कार्यालयों पर कब्जा करना।

साथ ही, उनका उद्देश्य कश्मीरियों को भड़काकर भारत सरकार के विरुद्ध खड़ा करना था, लेकिन अयूब की यह चाल उल्टी पड़ गई। कश्मीरियों ने इन पाकिस्तानी सैनिकों की पहचान कर ली और 15 अगस्त 1965 को इसकी जानकारी भारतीय सेना तक पहुंचा दी। भारतीय सेना ने शुरुआत में ही कई आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लिया और विशेष कमांडो दस्तों को इन्हें पकड़ने या मारने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

हाजी पीर दर्रे पर भारतीय सेना का कब्जा

घुसपैठ के लिए पाकिस्तानी अक्सर हाजी पीर दर्रे का इस्तेमाल करते थे। 1949 के कराची समझौते के बाद यह क्षेत्र पाकिस्तान के अधिकार में चला गया था। हाजी पीर दर्रे पर कब्जा करने के लिए भारत की तीन बटालियनों को भेजा गया। भारतीय सेना ने कठिन परिस्थितियों और प्रतिकूल मौसम के बावजूद अदम्य साहस का परिचय देते हुए 28 अगस्त की सुबह 10:00 बजे तक हाजी पीर दर्रे पर तिरंगा फहरा दिया। 10 सितंबर तक कब्जे में ली गई सभी चौकियों को आपस में जोड़कर भारत ने पूरे हाजी पीर दर्रे पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इससे उरी से पुंछ पहुंचने के लिए जहां पहले 282 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता था, अब मात्र 56 किलोमीटर की दूरी रह गई थी।

इस प्रकार पाकिस्तान का ऑपरेशन जिब्राल्टर पूरी तरह विफल हो गया।

ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम और भारत का जवाब

जिब्राल्टर के असफल होने पर पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम’ शुरू किया। अखनूर जम्मू को श्रीनगर से जोड़ता था। इस पर कब्जा करने से भारतीय सेना की गतिविधियां बाधित हो जातीं और पाकिस्तान के लिए कश्मीर पर कब्जा करना आसान हो जाता। 1 सितंबर को सुबह पांच बजे पाकिस्तानी सेना छंब सेक्टर पर कब्जा करके तवी नदी के पास पहुंच गई थी। यहां से अखनूर ज्यादा दूर नहीं था। भारत की सेना इस अचानक हुए हमले के लिए तैयार नहीं थी।

भारत के थल सेना प्रमुख और वायु सेना प्रमुख तुरंत रक्षा मंत्री यशवंत राव चव्हाण से मिले। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के साथ विचार-विमर्श के बाद उन्होंने वायु सेना को छंब सेक्टर में हमले का आदेश दिया। शाम 5 बजकर 45 मिनट पर पठानकोट वायु सेना अड्डे से भारत के 8 वैंपायर विमानों ने उड़ान भरी। अंधेरा होने तक वायु सेना ने 13 पाकिस्तानी टैंक और 30-50 वाहन नष्ट कर दिए थे।

शास्त्री ने लाहौर पर आक्रमण का आदेश दिया

1 सितंबर 1965 की रात को प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उन्होंने अपने सचिव से कहा – “अब तो कुछ करना ही होगा।” उन्होंने पाकिस्तान पर हमला करने की योजना को मंजूरी दी। अखनूर में पाकिस्तान के हमले के दबाव को कम करने के लिए भारत ने एक नया मोर्चा खोलने का फैसला किया। इस पूरे अभियान का कोड वर्ड था ‘ऑपरेशन बैंगल’। पश्चिम क्षेत्र के कमांडर-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह ने 6 सितंबर को आगे बढ़ने का फैसला किया। पाकिस्तान को इसका पता न चले इसलिए जनरल हरबख्श सिंह शिमला में पहले से तय कार्यक्रम में शामिल हुए।

कार्यक्रम समाप्त होते ही हेलिकॉप्टर से सीमा पर पहुंचे और तुरंत अमृतसर में कर्फ्यू लगाने का आदेश दिया। निर्धारित समय पर भारत की सेना चार स्थानों से पाकिस्तान में प्रवेश कर गई और कुछ ही घंटों में डोगराई के उत्तर में भसीन, दोगाइच और वाहग्रियान पर कब्जा कर लिया। 22 सितंबर की सुबह साढ़े पांच बजे भारतीय सेना ने डोगराई पर कब्जा कर लिया। अगले एक दिन तक भारतीय सेना डोगराई से लाहौर पर गोले बरसाती रही। लाहौर भारत के हाथों में जाने का खतरा मंडरा रहा था।

असल उत्तर का ऐतिहासिक टैंक युद्ध

लाहौर के घिरने के बाद पाकिस्तान ने अपनी सेना और टैंक पंजाब की ओर मोड़ दिए। अब वह अमृतसर पर कब्जा करना चाहता था। अमेरिकी पैटन टैंकों की मदद से पाकिस्तान ने भारत की सीमा के 5 किमी अंदर खेमकरन पर कब्जा कर लिया था। अमृतसर को बचाने के लिए भारतीय सेना का अगला पड़ाव था – असल उत्तर गांव। पाकिस्तानी सेना अपने लगभग 300 टैंक और 10 हजार सैनिकों के साथ इस गांव की ओर बढ़ रही थी।

भारतीय सेना ने एक चतुर रणनीति अपनाई। उन्होंने टैंकरों और नहर से गन्ने के खेतों में पानी डाला, जिससे मिट्टी दलदली बन गई। इसके बाद सैनिकों ने ‘हॉर्सशू डिफेंस’ अपनाया, जिसमें सभी सैनिक ‘U’ के आकार में फॉर्मेशन बनाकर क्षेत्र की रक्षा करते हैं। जैसे ही पाकिस्तानी पैटन टैंक दलदली रास्ते में आए, उनकी गति धीमी हो गई। कई टैंक आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। तभी छिपे हुए भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी टैंकों पर हमला शुरू कर दिया। इस टैंक युद्ध को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा टैंक युद्ध माना जाता है।

हवलदार अब्दुल हमीद की वीरता

असल उत्तर की लड़ाई में कंपनी क्वार्टरमास्टर हवलदार अब्दुल हमीद एक मोबाइल टैंक तोप की कमान संभाल रहे थे। उनकी यूनिट एक टैंक पर हमला करने के बाद तुरंत अपनी स्थिति बदल लेती थी, जिससे जवाबी फायर करते दुश्मन को चकमा दे देती थी।इस तरह 9 सितंबर को ही उन्होंने 4 पाकिस्तानी पैटन टैंक नष्ट कर दिए। कई पाकिस्तानी सैनिक अपने टैंक युद्धक्षेत्र में छोड़कर भाग गए। माना जाता है कि इसी दिन अब्दुल हमीद का नाम परमवीर चक्र के लिए भेज दिया गया था।

10 सितंबर को लड़ाई फिर शुरू हुई। इस दिन फिर एक बार अब्दुल हमीद और उनकी पूरी बटालियन ने पाकिस्तानी टैंकों पर हमले शुरू कर दिए। इस दिन अब्दुल ने कुल 3 और टैंक नष्ट किए, लेकिन अंत में एक पाकिस्तानी गोले का शिकार होकर शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। पाकिस्तान ने असल उत्तर की लड़ाई में अपने 100 से अधिक पैटन टैंक खो दिए। जहां पाक सेना की हार हुई, वहां चारों ओर उनके टैंक बिखरे पड़े थे, जिसके कारण इस क्षेत्र का नाम ही ‘पैटन नगर’ पड़ गया।

युद्ध का अंत और परिणाम

अमेरिका ने भारत को धमकी दी थी कि अगर युद्धविराम नहीं हुआ तो गेहूं का निर्यात रोक दिया जाएगा। इसके जवाब में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सप्ताह में एक बार उपवास करने की अपील की। युद्ध में स्वयं को हारते देखकर पाकिस्तान ने तुरंत चीन का सहारा लिया। चीन ने 16 सितंबर को भारत को पत्र लिखकर कहा – “जब तक भारत पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़ता रहेगा, तब तक चीन पाकिस्तान के अधिकार की लड़ाई में उसका साथ देगा।”

संयुक्त राष्ट्र के हस्तक्षेप और बढ़ते अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण भारत युद्धविराम के लिए राजी हो गया। 22 सितंबर को शास्त्री ने देशवासियों से कहा – “पाकिस्तान ने युद्धविराम का प्रस्ताव रखा है, जो उनकी मजबूरी है। भारत ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है।” इस युद्ध में भारत ने 1,920 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा किया था और पाकिस्तान ने 540 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर। भारत के 2,735 और पाकिस्तान के 5,988 सैनिक शहीद हुए।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान इतने निराश हुए कि उन्होंने एक मंत्रिमंडल की बैठक में कहा था – “मैं चाहता हूं कि यह समझ लिया जाए कि पाकिस्तान 50 लाख कश्मीरियों के लिए 10 करोड़ पाकिस्तानियों का जीवन कभी खतरे में नहीं डालेगा…कभी नहीं।” 10 जनवरी 1966 को भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान के बीच सोवियत संघ की मध्यस्थता में ताशकंद समझौता हुआ। इसमें दोनों देशों ने युद्ध शुरू होने से पहले वाली स्थिति पर लौटने का समझौता किया।

दुखद रूप से, समझौते पर हस्ताक्षर करने के अगले दिन भारतीय प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंद में हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई। इस प्रकार 1965 का भारत-पाकिस्तान युद्ध भारत की एक महत्वपूर्ण सैन्य सफलता बन गया, जिसने दिखा दिया कि भारत अपनी सीमाओं की रक्षा करने में पूरी तरह सक्षम है।

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