नई दिल्ली में निशिकांत दुबे सुप्रीम कोर्ट विवाद ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाओं को लांघ रहा है और देश में गृहयुद्ध व धार्मिक युद्ध भड़काने के लिए जिम्मेदार है। दुबे ने यह भी कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट ही कानून बनाएगा, तो संसद को बंद कर देना चाहिए। इस बयान पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है।
क्या है विवाद की जड़?
निशिकांत दुबे सुप्रीम कोर्ट विवाद की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से हुई। 8 अप्रैल 2025 को तमिलनाडु सरकार बनाम राज्यपाल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल के पास कोई ‘पॉकेट वीटो’ शक्ति नहीं है। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति को भेजे गए विधेयकों पर राष्ट्रपति को तीन महीने के भीतर फैसला लेना होगा। यह आदेश 11 अप्रैल 2025 को सार्वजनिक हुआ।
इस फैसले पर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रपति को समय सीमा तय करने का निर्देश देना संवैधानिक ढांचे के खिलाफ है। धनखड़ ने अनुच्छेद 142 को “लोकतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ 24×7 उपलब्ध परमाणु मिसाइल” करार दिया।
निशिकांत दुबे ने क्या कहा?
झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा:
- सुप्रीम कोर्ट अपनी सीमाएं लांघ रहा है और देश में गृहयुद्ध के लिए CJI संजीव खन्ना जिम्मेदार हैं।
- संसद को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट नए कानून बना रहा है। अगर ऐसा ही चलेगा, तो संसद और विधानसभाएं बंद कर देनी चाहिए।
- राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति को निर्देश कैसे दे सकता है?
- सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 377 (समलैंगिकता को अपराध मानने वाला कानून) और आईटी एक्ट की धारा 66A को खत्म कर दिया, जो संसद के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप है।
- राम मंदिर, ज्ञानवापी, और कृष्ण जन्मभूमि जैसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट दस्तावेज मांगता है, लेकिन मस्जिदों के लिए ऐसा नहीं करता। इससे धार्मिक युद्ध भड़क रहा है।
दुबे ने यह भी कहा कि संविधान का अनुच्छेद 368 संसद को कानून बनाने का अधिकार देता है, जबकि अनुच्छेद 141 सुप्रीम कोर्ट को केवल कानून की व्याख्या करने का अधिकार देता है।
विपक्ष और पूर्व जज की प्रतिक्रिया
निशिकांत दुबे सुप्रीम कोर्ट विवाद पर विपक्ष ने कड़ा रुख अपनाया है:
- कांग्रेस सांसद जयराम रमेश: सुप्रीम कोर्ट को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि इसने इलेक्टोरल बॉन्ड जैसे मुद्दों पर सरकार के खिलाफ फैसला दिया।
- कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद: सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठाना दुखद है। हमारी न्याय व्यवस्था में अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट का होता है।
- आप प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़: दुबे का बयान घटिया है। सुप्रीम कोर्ट को उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करनी चाहिए।
- पूर्व जज अशोक कुमार गांगुली: सुप्रीम कोर्ट का राष्ट्रपति को निर्देश देना संवैधानिक है। कोई भी कानून से ऊपर नहीं है।
- राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल: भारत में राष्ट्रपति नाममात्र का मुखिया है। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप तब जरूरी हो जाता है, जब कार्यपालिका काम नहीं करती।
विवाद की शुरुआत और अब तक का घटनाक्रम
8 अप्रैल 2025: सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु मामले में राज्यपाल की शक्तियों को सीमित करते हुए कहा कि उनके पास कोई वीटो शक्ति नहीं है। राष्ट्रपति को विधेयकों पर तीन महीने में फैसला लेने का निर्देश दिया।
11 अप्रैल 2025: सुप्रीम कोर्ट का आदेश सार्वजनिक हुआ।
17 अप्रैल 2025: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को “न्यायिक अतिक्रमण” करार दिया।
18 अप्रैल 2025: कपिल सिब्बल ने धनखड़ की टिप्पणी पर आपत्ति जताई और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप को जायज ठहराया।
19 अप्रैल 2025: निशिकांत दुबे ने सुप्रीम कोर्ट और CJI पर गंभीर आरोप लगाए, जिससे विवाद और गहरा गया।
क्यों है यह विवाद महत्वपूर्ण?
निशिकांत दुबे सुप्रीम कोर्ट विवाद भारतीय संविधान में शक्तियों के बंटवारे (Separation of Powers) के सिद्धांत को लेकर एक गंभीर बहस को जन्म दे रहा है। यह मामला विधायिका, कार्यपालिका, और न्यायपालिका के बीच संतुलन को प्रभावित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट का विधेयकों पर समय सीमा तय करने का फैसला संवैधानिक जवाबदेही को बढ़ाने की दिशा में एक कदम माना जा रहा है, लेकिन बीजेपी नेताओं का कहना है कि यह संसद की संप्रभुता पर सवाल उठाता है।
विपक्ष का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप लोकतंत्र को मजबूत करता है, खासकर तब जब कार्यपालिका या राज्यपाल संवैधानिक जिम्मेदारियों से बचते हैं।
आगे क्या होगा?
निशिकांत दुबे ने कहा कि संसद के अगले सत्र में इस मुद्दे को उठाया जाएगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सुप्रीम कोर्ट दुबे के बयानों पर स्वत: संज्ञान लेता है या यह मामला संसद में गहन बहस का विषय बनता है। निशिकांत दुबे सुप्रीम कोर्ट विवाद ने निश्चित रूप से देश में एक नई राजनीतिक और संवैधानिक चर्चा को जन्म दे दिया है।
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